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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [वेदवाणी] (मनसा) मनन के साथ (देवान्) विजय चाहनेवाले [ब्रह्मचारियों] को (सम्) यथावत् (कल्पयति) समर्थ करती है, (तत्) तब [उनको] (अपि गच्छति) अवश्य मिलती है। (तथा ह) इसी कारण से (ब्रह्माणः) ब्रह्मचारी लोग (वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] के (याचितुम्) माँगने के लिये (उपप्रयन्ति) पहुँचते जाते हैं ॥३१॥
भावार्थभाषाः - जैसे-जैसे ब्रह्मचारी लोग वेदवाणी के लिये प्रयत्न करते हैं, वैसे-वैसे ही वेदवाणी उन्हें समर्थ करके मिलती जाती है ॥३१॥
टिप्पणी: ३१−(मनसा) मननेन (सम्) सम्यक् (कल्पयति) समर्थयति वेदवाणी (तत्) तदा (देवान्) विजिगीषून् ब्रह्मचारिणः (अपि) एव (गच्छति) प्राप्नोति (ततः) तस्मात् कारणात् (ह) एव (ब्रह्माणः) ब्रह्मचारिणः (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (उपप्रयन्ति) समीपे गच्छन्ति (याचितुम्) प्रार्थयितुम् ॥
