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देवता: वशा ऋषि: कश्यपः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: वशा गौ सूक्त

आ॒विरा॒त्मानं॑ कृणुते य॒दा स्थाम॒ जिघां॑सति। अथो॑ ह ब्र॒ह्मभ्यो॑ व॒शा या॒च्ञाय॑ कृणुते॒ मनः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आवि: । आत्मानम्। कृणुते । यदा । स्थाम । जिघांसति । अथो इति । ह । ब्रह्मऽभ्य: । वशा । याञ्चाय । कृणुते । मन: ॥४.३०॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:30


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - वह [वेदवाणी] (आत्मानम्) अपने स्वरूप [तत्त्वज्ञान] को (आविः कृणुते) प्रकट करती है, (यदा) जब वह [ब्रह्मचारी] (स्थाम) ठिकाने पर (जिघांसति) जाना चाहता है। (अथो ह) तब ही (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (ब्रह्मभ्यः) ब्रह्मचारियों के पाने को (याच्ञाय) माँगने के लिये (मनः) मनन (कृणुते) करती है ॥३०॥
भावार्थभाषाः - जैसे-जैसे ब्रह्मचारी प्रयत्न करता है वेदवाणी भी उसको वैसे-वैसे ही अधिक-अधिक मिलती चली जाती है ॥३०॥
टिप्पणी: ३०−(आत्मानम्) तत्त्वबोधम् (आविष्कृणुते) प्रकटयति (अथो ह) तदैव (ब्रह्मभ्यः) ब्रह्मचारिभ्यः (वशा) कमनीया वेदवाणी (याच्ञाय) याचृ याच्ञायाम्−नङ्। याचनाय (कृणुते) करोति (मनः) मननम्। अन्यत् पूर्ववत्−म० २९ ॥