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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कूटया) [वेदवाणी के] नहीं देने से (अस्य) उस पुरुष के (गृहाः) घर (सं शीर्यन्ते) सर्वथा नष्ट किये जाते हैं, और (बण्डया) ढक देने से (दह्यन्ते) जलाये जाते हैं, (श्लोणया) बटोर रखने से (काटम्) अपनी प्रसिद्धता को (अर्दति) वह नष्ट करता है, और (काणया) मूँद रखने से (स्वम्) [उसका] सर्वस्व (दीयते) बट जाता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - वेदवाणी के उपदेश और प्रचार के विना मनुष्य तनक्षीण, मनमलीन और धनहीन होकर महा कष्ट पाते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−(कूटया) कूट दानाभावे−घञ्। टाप्। अदानेन (अस्य) पुरुषस्य (सं शीर्यन्ते) सर्वथा नाश्यन्ते (श्लोणया) श्लोणृ संघाते−घञ्। राशीकरणेन (काटम्) कटी गतौ−घञ्। प्राकट्यम्। प्रसिद्धिम् (अर्दति) नाशयति (बण्डया) बडि विभाजने वेष्टने च−घञ्। वेष्टनेन (दह्यन्ते) भस्मीक्रियन्ते (गृहाः) निवासाः (काणया) कण निमीलने−घञ्। निमीलनेन (दीयते) दीङ् क्षये। नश्यति (स्वम्) सर्वस्वम् ॥
