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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवानाम्) विद्वानों का (निहितः) नियम से रक्खा हुआ (निधिः) निधि, [अर्थात्] (बहुधा) नाना प्रकार से (चरन्ती) विचरती हुई (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] तू (रूपाणि) रूपों [तत्त्वज्ञानों] को (आविः कृणुष्व) प्रकट कर, (यदा) जब वह [ब्रह्मचारी] (स्थाम्) ठिकाने पर (जिघांसति) जाना चाहता है ॥२९॥
भावार्थभाषाः - जब ब्रह्मचारी कटिबद्ध होकर वेदवाणी का उपार्जन करता है, तब ही वह तत्त्वज्ञानों को जानता चला जाता है ॥२९॥
टिप्पणी: २९−(वशा) कमनीया वेदवाणी (चरन्ती) विचरन्ती (बहुधा) नानाप्रकारेण (देवानाम्) विदुषाम् (निहितः) नियमेन स्थापितः (निधिः) कोशः (आविष्कृणुष्व) प्रकाशय (रूपाणि) तत्त्वज्ञानानि (यदा) (स्थाम) सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। ष्ठा गतिनिवृत्तौ−मनिन्। स्थितिस्थानम् (जिघांसति) हन हिंसागत्योः−सन्। गन्तुमिच्छति ॥
