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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कामाय) इष्ट पदार्थ पाने के लिये (अग्नीषोमाभ्याम्) अग्नि और जल, (मित्राय) प्राण (च) और (वरुणाय) अपान वायु, (तेभ्यः) इन सब की सिद्धि के लिये (ब्राह्मणाः) ब्राह्मण [ब्रह्मचारी लोग] (याचन्ति) [वेदवाणी को] माँगते हैं, (अददत्) न देता हुआ पुरुष (तेषु) उन [विद्वानों] में (आ) सब ओर से (वृश्चते) छिन्न हो जाता है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचारी अग्निविद्या, जलविद्या, वायु के उतार-चढ़ाव की विद्या और अन्य विद्वानों की सिद्धि के लिये वेदविद्या में परिश्रम करते हैं। ऐसे शुभ कर्म में विघ्नकारी मनुष्य कष्ट मे पड़ते हैं ॥२६॥
टिप्पणी: २६−(अग्नीषोमाभ्याम्) अग्निजलविद्यासिद्धये (कामाय) इष्टपदार्थप्राप्तये (मित्राय) प्राणविद्याप्राप्तये (वरुणाय) अपानविद्याप्राप्तये (च) (तेभ्यः) पूर्वोक्तेभ्यः (याचन्ति) प्रार्थयन्ते (ब्राह्मणाः) वेदाध्येतारः (तेषु) ब्राह्मणेषु (आ) समन्ताम् (वृश्चते) छिद्यते (अददत्) अप्रयच्छन् ॥
