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देवता: वशा ऋषि: कश्यपः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: वशा गौ सूक्त

अ॑नप॒त्यमल्प॑पशुं व॒शा कृ॑णोति॒ पूरु॑षम्। ब्रा॑ह्म॒णैश्च॑ याचि॒तामथै॑नां निप्रिया॒यते॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अनपत्यम् । अल्पऽपशुम् । वशा । कृणोति । पुरुषम् । ब्राह्मणै: । च । याचिताम् । अथ । एनाम् । निऽप्रिययते ॥४.२५॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:25


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (पुरुषम्) पुरुष को (अनपत्यम्) बिन सन्तान और (अल्पपशुम्) थोड़े पशुओं [गौ आदि] वाला (कृणोति) कर देती है। (अथ च) यदि वह [पुरुष] (ब्राह्मणैः) ब्राह्मण [ब्रह्मचारियों] करके (याचिताम्) माँगी हुई (एनाम्) इस [वेदवाणी] को (निप्रियायते) ओछेपन से प्रिय सा मानता है ॥२५॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य वेदवाणी को संकुचित करके योग्य ब्रह्मचारियों की उन्नति रोककर अपनी ही उन्नति चाहता है, वह दुर्बलेन्द्रिय पुरुष अपना सर्वस्व नाश कर देता है ॥२५॥
टिप्पणी: २५−(अनपत्यम्) सन्तानरहितम् (अल्पपशुम्) पशुभिर्न्यूनम् (वशा) कमनीया वेदवाणी (कृणोति) करोति (पुरुषम्) (ब्राह्मणैः) ब्रह्मचारिभिः (च) (याचिताम्) प्रार्थिताम् (अथ) यदि (एनाम्) वेदवाणीम् (निप्रियायते) म० २१। नीचभावेन प्रिय इवाचरति ॥