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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो पुरुष (एवम्) इस प्रकार (विदुषे) विद्वान् को (अदत्वा) न देकर (अथ) फिर (अन्येभ्यः) दूसरों [दुर्बलेन्द्रियों] को (वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (ददत्) देता हुआ है। (तस्मै) उस पुरुष के लिये (अधिष्ठाने) प्रभाव के बीच (सहदेवता) देवताओं विद्वानों सहित (पृथिवी) पृथिवी (दुर्गा) दुर्गम [कठिन] होती है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष अधिकारी ब्रह्मचारियों का अनादर करके दुर्बलेन्द्रिय लम्पटों को वेदविद्या का अधिकार देता है, वह न तो पृथिवी का राज्य कर सकता है और न विद्वानों में आदर पा सकता है ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(यः) (एवम्) ईदृग्विधम् (विदुषे) ज्ञानिने (अदत्वा) (अध) पुनः (अन्येभ्यः) दुर्बलेन्द्रियेभ्यः (ददत्) प्रयच्छन् (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (दुर्गा) दुष्प्राप्या (तस्मै) अविदुषे (अधिष्ठाने) प्राधान्ये (पृथिवी) (सहदेवता) विद्वद्भिः सहिता ॥
