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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) यदि (ब्राह्मणाः=ब्राह्मणेभ्यः) ब्राह्मणों [ब्रह्मचारियों] से (अन्ये) दूसरे [निर्बलेन्द्रिय] (शतम्) सौ [पुरुष] (गोपतिम्) पृथिवी की पालनेवाली (वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] को (याचेयुः) माँगें। (अथ) तो (देवाः) देवताओं [विद्वानों] ने (एनाम्) इस [वेदवाणी] को (अब्रुवन्) बताया है−“(एवम्) इस प्रकार [पूरे-पूरे] (विदुषः) विद्वान् की (ह) ही (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - दुर्बलेन्द्रिय अश्रद्धालु मनुष्य सैकड़ों मिलकर वेदवाणी से उपकार नहीं कर सकते, परन्तु पूर्ण विद्वान् जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी अकेला ही संसार भर को लाभ पहुँचाता है ॥२२॥
टिप्पणी: २२−(यत्) यदि (अन्ये) विरोधिनः। अब्राह्मणाः (शतम्) बहुसंख्याकाः (याचेयुः) प्रार्थयेरन् (ब्राह्मणाः) सुपां सुपो भवन्तीति वक्तव्यम्। वा० पा० ७।१।३९। इति पञ्चमीस्थाने प्रथमा। ब्राह्मणेभ्यः। ब्रह्मचारिभ्यः (गोपतिम्) पृथिवीपालिकाम् (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (अथ) तदा (एनाम्) वेदवाणीम् (देवाः) विद्वांसः (अब्रुवन्) अकथयन् (एवम्) अनेन प्रकारेण (ह) निश्चयेन (विदुषः) जानतः पुरुषस्य (वशा) ॥
