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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) विजय चाहनेवालों ने (ब्राह्मणम्) ब्राह्मण [वेदज्ञानी] को (मुखम्) मुख [मुखिया] (कृत्वा) बनाकर (वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] को (अयाचन्) माँगा है। (अददत्) [वेदवाणी] न देता हुआ (मानुषः) मनुष्य (तेषां सर्वेषाम्) उन सब [विद्वानों] के (हेडम्) क्रोध को (नि) निश्चय करके (एति) पाता है ॥२०॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य विजय पाने के लिये निर्भय पूर्ण विद्वान् द्वारा वेदों का उपदेश चाहते हैं, इसलिये उसके बाधक को सब विद्वान् धिक्कारते हैं ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(देवाः) विजिगीषवः (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (अयाचन्) याचितवन्तः (मुखम्) मुख्यम्। प्रधानम् (कृत्वा) विधाय (ब्राह्मणम्) वेदज्ञम् (तेषाम्) विजिगीषूणाम् (सर्वेषाम्) (अददत्) ददातेः शतृ। अप्रयच्छन् (हेडम्) क्रोधम् (नि) निश्चयेन (एति) प्राप्नोति (मानुषः) मनोर्जातावञ्यतौ षुक् च। पा० ४।१।१६१। मनु−अञ् षुक् च। मनुर्मननं यस्य सः। मनुष्यः ॥
