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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह पुरुष (प्रजया) अपने सन्तान [पुत्र पुत्री आदि] के साथ (वि क्रीणीते) बिक जाता है (च) और (पशुभिः) अपने पशुओं [गाय घोड़े आदि] के साथ (उप दस्यति) नष्ट हो जाता है। (यः) जो पुरुष (याचद्भ्यः) माँगते हुए (आर्षेयेभ्यः) ऋषिसन्तानों को (देवानाम्) विजय चाहनेवालों के बीच (गाम्) वेदवाणी (न) नहीं (दित्सति) देना चाहता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वान् विद्वानों के बीच जिज्ञासुओं को वेदविद्या नहीं देता, वह निर्धन होकर अपने आप और उसके सन्तान पराधीन होकर कष्ट सहते हैं ॥२॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा भाग आगे मन्त्र १२ में आया है ॥
टिप्पणी: २−(प्रजया) स्वसन्तानेन सह (सः) (वि क्रीणीते) परिव्यवेभ्यः क्रियः। पा० १।३।१८। इत्यात्मनेपदम्। विक्रीयते (पशुभिः) गवाश्वादिभिः सह (च) समुच्चये (उप दस्यति) उपदस्यते। उपक्षीयते (यः) (आर्षेयेभ्यः) अ० ११।१।१६। इतश्चानिञः। पा० ४।१।१२२। ऋषि−ढक्। ऋषिसन्तानेभ्यः (याचद्भ्यः) (देवानाम्) विजिगीषूणां मध्ये (गाम्) वेदवाणीम्। गौर्वाङ्नाम−निघ० १।११। (न) (निषेधे) (दित्सति) दातुमिच्छति ॥
