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देवता: वशा ऋषि: कश्यपः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: वशा गौ सूक्त

दु॑रद॒भ्नैन॒मा श॑ये याचि॒तां च॒ न दित्स॑ति। नास्मै॒ कामाः॒ समृ॑ध्यन्ते॒ यामद॑त्त्वा॒ चिकी॑र्षति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दुरदभ्ना । एनम् । आ । शये । याचिताम् । च । न । दित्सति । न । अस्मै । कामा: । सम । ऋध्यन्ते । याम् । अदत्वा । चिकीर्षति ॥४.१९॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:19


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (दुरदभ्ना) कभी न दबनेवाली [वह वेदवाणी (एनम्) इस [मनुष्य] पर (आ शये) आ पड़ती है, (च) यदि वह (याचिताम्) माँगी हुई [वेदवाणी] को (न) नहीं (दित्सति) देना चाहता है। (अस्मै) इस [मनुष्य] के लिये (कामाः) वे कामनाएँ (न) नहीं (सम् ऋध्यन्ते) सिद्ध होती हैं, [जिन कामनाओं को] (याम् अदत्त्वा) जिस [वेदवाणी] के न देने पर (चिकीर्षति) पूरा करना चाहता है ॥१९॥
भावार्थभाषाः - वेदवाणी के प्रसिद्ध करने में जो लोग बाधा डालते हैं, उनकी कामनाएँ कभी पूरी नहीं होती हैं ॥१९॥
टिप्पणी: १९−(दुरदभ्ना) म० ४। कदापि नहि दम्भनीया पराजेयाः (एनम्) मनुष्यम् (आ शये) आशेते। प्राप्नोति (याचिताम्) प्रार्थिताम् (च) यदि (न) निषेधे (दित्सति) दातुमिच्छति (न) (अस्मै) (कामाः) अभिलाषा (समृध्यन्ते) संसिध्यन्ति (याम्) वेदवाणीम् (अदत्त्वा) (चिकीर्षति) कर्तुमिच्छति ॥