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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [विद्वान्] (अस्याः) इस [वेदवाणी] के (ऊधः) सींचने को, (अथो उत) और भी (अस्याः) इसके (स्तनान्) गर्जन शब्दों [बड़े उपदेशों] को (न) अव [विद्या प्राप्त करके] (वेद) जानता है। वह [वेदवाणी] (उभयेन) दोनों [इस लोक और परलोक के सुख] से (एव) ही (अस्मै) इस [ब्रह्मज्ञानी] को (दुहे) भर देती है, (च, इत्=चेत्) जो (वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (दातुम् अशकत्) दे सका है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य वेदों के पवित्र लाभों और उपदेशों को समझ लेता है और संसार में प्रकाश करता है, वह इस जन्म और दूसरे जन्म का आनन्द पाता है ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(यः) विद्वान् (अस्याः) वेदवाण्याः (ऊधः) उन्दी क्लेदने−असुन्, पृषोदरादिरूपम्। सेचनम्। वर्धनम् (न) संप्रति−निरु० ७।३१। (वेद) जानाति (अथो) अपि च (अस्याः) (स्तनान्) स्तन मेघशब्दे−अच्। मेघशब्दान्। उच्चोपदेशान् (उत) एव (उभयेन) ऐहिकपारमार्थिकसुखद्वयेन (एव) अवधारणे (अस्मै) विदुषे (दुहे) दुग्धे। प्रपूरयति वशा (दातुम्) (चेत्) यदि (अशकत्) शक्तोऽभूत् (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् ॥
