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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अविज्ञातगदा) नहीं जाना गया है दोष जिसमें, ऐसी [निर्दोष], (सती) सद्गुणोंवाली [वेदवाणी] (आ त्रैहायणात्) तीन उद्योगों [परमेश्वर के कर्म, उपासना, ज्ञान] तक (एव) अवश्य (चरेत्) विचरती रहे। (नारद) हे नारद ! [नीति, यथार्थ ज्ञान, देनेवाले विद्वान्] (वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] को (च) निश्चय करके (विद्यात्) [मनुष्य] जाने, (तर्हि) तब (ब्राह्मणाः) ब्राह्मण [पूरे वेदज्ञाता लोग] (एष्याः) ढूँढ़ने योग्य हैं ॥१६॥
भावार्थभाषाः - वेदवाणी सर्वथा निर्दोष और श्रेष्ठगुणवाली है, मनुष्य पूर्ण विद्वानों द्वारा उसको प्राप्त करके ईश्वर के कर्म, उपासना और ज्ञान से अपनी उन्नति करे ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(चरेत्) विचरेत् (एव) निश्चयेन (आ) मर्यादायाम् (आ त्रैहायणात्) अ० १०।५।२२। हश्च व्रीहिकालयोः। पा० ३।१।१८४। ओहाक् त्यागे, ओहाङ् गतौ च−ण्युट्। आतो युक् चिण्कृतोः। पा० ७।३।३३। युक्, बाहुलकात्। तस्य समूहः। पा० ४।२।३७। अण्। त्रयाणां हायनानां गतीनां परमेश्वरस्य कर्मोपासनाज्ञानरूपाणामुद्योगानां समूहप्राप्तिपर्यन्तम् (अविज्ञातगदा) गद रोगे−अच्। अविज्ञातो गदो रोगो दोषो यस्यां सा। अविदितदोषा (सती) सद्गुणवती (वशाम्) वेदवाणीम् (च) अवश्यम् (विद्यात्) जानीयात् (नारद) अ० ५।१९।९। नॄ नये−घञ्, नारं नयं नीतिं ददादीति, दा−क। हे नयप्रद विद्वन् (ब्राह्मणाः) पूर्णवेदज्ञानिनः (तर्हि) तदा (एष्याः) अन्वेषणीयाः ॥
