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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (निहितः) नियम से रक्खा हुआ (शेवधिः) निधि [सुखदायक पदार्थ] होता है, (तथा) वैसे ही (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (ब्राह्मणानाम्) ब्राह्मणों [वेदज्ञानियों] की है। (एतत्) इसीलिये (ताम्) उस [वेदवाणी] को (अच्छ−आयन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त करते हैं, (यस्मिन् कस्मिन् च) चाहे जिस किसी में (जायते) वह होवे ॥१४॥
भावार्थभाषाः - यह वेदवाणी ईश्वर ने वेदवेत्ताओं को संसार के सुख के लिये निधि के समान सौंपी है। मनुष्य उसको वेदद्वारा परमाणु से लेकर ईश्वरपर्यन्त खोजकर प्राप्त करें ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(यथा) येन प्रकारेण (शेवधिः) सुखप्रदः। निधिः−निरु० २।४। (निहितः) नियमेन स्थापितः (ब्राह्मणानाम्) ब्रह्मज्ञानिनाम् (तथा) (वशा) कमनीया वेदवाणी (ताम्) वेदवाणीम् (एतत्) एतस्मात्कारणात् (अच्छायन्ति) आभिमुख्येन प्राप्नुवन्ति (यस्मिन्) (कस्मिन्) (च) सम्भावनायाम् (जायते) वर्तते ॥
