0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो पुरुष (वनिम्) सेवनीय (एनाम्) इस [वेदवाणी] को (आयन्ति) प्राप्त करते हैं, (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (तेषाम्) उनकी (देवकृता) विजय इच्छा सिद्ध करनेवाली है। (तत्) यह [वचन] (ब्रह्मज्येयम्) ब्रह्माओं [वेदवेत्ताओं] के हानि करने योग्य [पुरुष] से (अब्रुवन्) उन [विद्वानों] ने कहा है, (यः) जो (एनाम्) इस [वेदवाणी] को (निप्रियायते) तुच्छपन से प्रिय सा मानता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो ब्रह्मचारी श्रम करक वेदविद्या प्राप्त करते हैं, वे विजयी होते हैं, और दम्भी पाखण्डी पण्डित मन्यमानी मनुष्य को विद्वान् लोग त्याग देते हैं, ऐसा निश्चय करना चाहिये ॥११॥
टिप्पणी: ११−(ये) विद्वांसः (एनाम्) वेदवाणीम् (वनिम्) सेवनीयाम् (आयन्ति) समन्तात् प्राप्नुवन्ति (तेषाम्) विदुषाम् (देवकृता) देवो विजिगीषा कृता साधिता यया सा (वशा) म० १। कमनीया वेदवाणी (ब्रह्मज्येयम्) ब्रह्म+ज्या वयोहानौ−यत्, आकारस्व ईत्वम्। ब्रह्माणो वेदविदो ज्येया हानियोग्या यस्य तं विदुषां हानिकरम् (तत्) वचनम् (अब्रुवन्) अकथयन् विद्वांसः (यः) मूर्खः (एनाम्) वेदवाणीम् (निप्रियायते) कर्तुः क्यङ् सलोपश्च। पा० ३।१।१०। इति प्रिय−क्यङ्। नि नीचभावेन प्रिय इवाचरति ॥
