परस्पर उन्नति करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो [लोक] (यज्वनाम्) यज्ञ [श्रेष्ठ व्यवहार] करनेवालों के (अभिजिताः) सब ओर से जीते हुए और (स्वर्गाः) सुख पहुँचानेवाले हैं, (तेषाम्) उन [लोकों] के मध्य (यः) जो [परमेश्वर] (अग्रे) पहिले से (ज्योतिष्मान्) प्रकाशमय और (मधुमान्) ज्ञानमय है, (तस्मिन्) उस [परमेश्वर] में (वर्तमान) (उभे) दोनों (नभसी) सूर्य और पृथिवी [प्रकाशमान और अप्रकाशमान] लोकों को (च) और (उभयान्) दोनों [स्त्री-पुरुष] समूहवाले (लोकान्) लोकों [समाजों वा घरों] को (पुत्रैः) अपने पुत्रों [दुःख से बचानेवालों] के साथ (जरसि) स्तुति में रहकर (सं श्रयेथाम्) तुम दोनों [स्त्री-पुरुष] मिलकर सेवो ॥६॥
भावार्थभाषाः - स्त्री-पुरुषों को चाहिये कि विद्वानों के समान परमात्मा के रचे पदार्थों से यथावत् उपकार लेकर अपने विद्वान् धीर सन्तानों के साथ कीर्तिमान् होकर आनन्द पावें ॥६॥