परस्पर उन्नति करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राच्यै दिशे) पूर्व वा सन्मुखवाली दिशा में जाने के निमित्त (अग्नये) ज्ञानस्वरूप, (अधिपतये) अधिष्ठाता, (असिताय) बन्धनरहित, (रक्षित्रे) रक्षक परमेश्वर को (इषुमते) बाणवाले [वा हिंसावाले] (आदित्याय) सूर्य [के ताप] रोकने के लिये (एतम्) इस (त्वा) तुझे [जीवात्मा को] (परि दद्मः) हम सौंपते हैं। (तम्) उस [जीवात्मा] को (नः) हमारे अर्थ, (अस्माकम्) हमारी (ऐतोः) सब ओर गति के लिये (आ) सब ओर से (गोपायत) तुम [विद्वानो] बचाओ। वह [परमेश्वर] (नः) हमें (अत्र) यहाँ [संसार में] (दिष्टम्) नियत कर्म की ओर (जरसे) स्तति के लिये (नि नेषत्) ले ही चले। और (जरा) स्तुति [ही] (नः) हमें (मृत्यवे) मृत्यु को (परि ददातु) सौंपे [अर्थात् हम स्तुति के साथ मरें]। (अथ) सो (पक्वेन सह) परिपक्व [दृढ़] स्वभाववाले परमात्मा के साथ (सं भवेम) हम समर्थ होवें ॥५५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि पूर्व वा सन्मुखवाली तथा दूसरी दिशाओं में चलते हुए वे उस सर्वज्ञ, सर्वस्वामी, सर्वरक्षक परमात्मा को ध्यान में रखकर विद्वानों के सत्सङ्ग से अपनी गति बढ़ावें और वेदविहित कर्म करके संसार में कीर्तिमान् होवें और प्रयत्न करके कीर्ति के साथ ही वे शरीर को छोड़ें। यही प्रार्थना परमात्मा से सदा करते रहें। यही भावार्थ अगले मन्त्रों में लगा लें ॥५५॥ मन्त्र ५५-६० के प्रथम भागों का मिलान−अथर्व० का० ३ सू० २७ म० १-६ के प्रथम भागों से यथाक्रम करें (अथ पक्वेन...) अन्तिम भाग अथर्व० ६।११९।२ के अन्त में आया है ॥