परस्पर उन्नति करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (स्वर्गः) सुख पहुँचानेवाले [परमेश्वर] ने (तन्वम्) इस फैलावट [सृष्टि] को (बहुधा) बहुत प्रकार से (वि) विशेष करके (चक्रे) बनाया है, (यथा) जैसा (आत्मन्) परमात्मा के भीतर (अन्यवर्णाम्) भिन्नवर्ण [रूप]वाली [सृष्टि] को (विदे) मैं पाता हूँ। (कृष्णाम्) काली [अन्धकारयुक्त] (रुशतीम्) कष्ट देनेवाली [फैलावट] को (पुनानः) शुद्ध करनेवाले [परमेश्वर] ने (अप अजैत्) जीत लिया है, (या) जो (लोहिनी) लोहमयी [कठोर फैलावट] है, (ताम्) उस [फैलावट] को (ते) तेरे (अग्नौ) ज्ञान पर (जुहोमि) मैं छोड़ता हूँ ॥५४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ने विविध सृष्टि को हमारे सुख के लिये रचकर अपने वश में रक्खा है और सब रुकावटों को हटाया है। मनुष्यों को जितना-जितना ज्ञान होता जाता है, उतना ही वह परमेश्वर पर विश्वास करता है ॥५४॥