व॒र्षं व॑नु॒ष्वापि॑ गच्छ दे॒वांस्त्व॒चो धू॒मं पर्युत्पा॑तयासि। वि॒श्वव्य॑चा घृ॒तपृ॑ष्ठो भवि॒ष्यन्त्सयो॑निर्लो॒कमुप॑ याह्ये॒तम् ॥
पद पाठ
वर्षम् । वनुष्व । अपि । गच्छ । देवान् । त्वच: । धूमम् । परि । उत् । पातयासि । विश्वऽव्यचा: । घृतऽपृष्ठ: । भविष्यन् । सऽयोनि: । लोकम् । उप । याहि । एतम् ॥३.५३॥
अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:53
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परस्पर उन्नति करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे पुरुष !] तू (वर्षम्) वरणीय [श्रेष्ठ] कर्म का (वनुष्व) सेवन कर, (देवान्) कामनायोग्य गुणों को (अपि) अवश्य (गच्छ) प्राप्त हो, (त्वचः) अपनी खाल [देह] से (धूमम्) धुएँ [मैल] को (परि) सब ओर (उत् पातयासि) उड़ा दे। (विश्वव्यचाः) सब व्यवहारों में फैला हुआ, (घृतपृष्ठः) प्रकाश से सींचता हुआ और (सयोनिः) समान घरवाला (भविष्यन्) भविष्यत् में होता हुआ तू (एतम्) इस (लोकम्) लोक [व्यवहार मण्डल] में (उप याहि) पहुँच ॥५३॥
भावार्थभाषाः - सब स्त्री-पुरुष शुभ कर्म और शुभ गुणों को प्राप्त होकर अज्ञान को दूर फेंकें, जैसे प्रकाश के बल से धुआँ इतर-वितर हो जाता है। और वे ज्ञानी पुरुष संसार के सब काम साधने में साधु होवें ॥५३॥ इस मन्त्र का दूसरा भाग ऊपर मन्त्र १९ में आ चुका है ॥
टिप्पणी: ५३−(वर्षम्) वृतॄवदिवचि०। उ० ३।६२। वृञ् वरणे−स प्रत्ययः। वरणीयं स्वीकरणीयं कर्म (वनुष्व) सेवस्व (अपि) अवश्यम् (गच्छ) प्राप्नुहि (देवान्) कामनीयान् गुणान् (त्वचः) चर्मणः। देहात् (परि) सर्वतः (उत्) ऊर्ध्वम् (पातयासि) लेट्। गमय। अन्यत् पूर्ववत्−म० १९ ॥
