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वसो॒र्या धारा॒ मधु॑ना॒ प्रपी॑ना घृ॒तेन॑ मि॒श्रा अ॒मृत॑स्य॒ नाभ॑यः। सर्वा॒स्ता अव॑ रुन्धे स्व॒र्गः ष॒ष्ट्यां श॒रत्सु॑ निधि॒पा अ॒भीच्छा॑त् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वसो: । या: । धारा: । मधुना । प्रऽपीना: । घृतेन । मिश्रा: । अमृतस्य । नाभय: । सर्वा: । ता: । अव । रुन्धे । स्व:ऽग: । षष्ट्याम्। शरत्ऽसु । निधिऽपा: । अभि । इच्छात् ॥३.४१॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:41


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परस्पर उन्नति करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (वसोः) श्रेष्ठ गुण की (याः धाराः) जो धाराएँ (मधुना) विज्ञान [मधुविद्या] से (प्रपीनाः) बढ़ी हुई और (घृतेन) सार [तत्त्वज्ञान] से (मिश्राः) मिली हुई (अमृतस्य) अमृत [मोक्षसुख] की (नाभयः) नाभिएँ [मध्यभाग] हैं। (ताः सर्वाः) उन सब [धाराओं] को (स्वर्गः) सुख पहुँचानेवाला [पुरुष] (अव रुन्धे) चौकसी से रख लेता है, और [उन को] (षष्ठ्याम्) साठ [अनेक] (शरत्सु) बरसों में (निधिपाः) निधियों का रक्षक [मनुष्य] (अभि इच्छात्) खोजे ॥४१॥
भावार्थभाषाः - श्रेष्ठ गुण संसार में ईश्वर के विज्ञान और सृष्टि के तत्त्वज्ञान से मनुष्य को बड़े प्रत्यक्ष और बड़े अभ्यास से प्राप्त होते हैं ॥४१॥ इस मन्त्र का चौथा पाद ऊपर मन्त्र ३४ में आ चुका है ॥
टिप्पणी: ४१−(वसोः) श्रेष्ठगुणस्य (याः) (धाराः) प्रवाहाः (मधुना) विज्ञानेन। मधुविद्यया (प्रपीनाः) प्रवृद्धाः (घृतेन) घृ सेके दीप्तौ−क्त। सारेण। तत्त्वज्ञानेन (मिश्राः) संयुक्ताः (अमृतस्य) मोक्षसुखस्य (नाभयः) मध्यभागाः (सर्वाः) (ताः) धाराः (अव रुन्धे) सावधानतया रक्षति (स्वर्गः) सुखप्रापकः पुरुषः। अन्यत् पूर्ववत्−म० ३४ ॥