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प्र य॑च्छ॒ पर्शुं॑ त्व॒रया ह॑रौ॒षमहिं॑सन्त॒ ओष॑धीर्दान्तु॒ पर्व॑न्। यासां॒ सोमः॒ परि॑ रा॒ज्यं ब॒भूवाम॑न्युता नो वी॒रुधो॑ भवन्तु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । यच्छ । पर्शुम् । त्वरय । आ । हर । ओषम् । अहिंसन्त: । ओषधी: । दान्तु । पर्वन् । यासाम् । सोम: । परि । राज्यम् । बभूव । अमन्युता: । न: । वीरुध: । भवन्तु ॥३.३१॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:31


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परस्पर उन्नति करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य !] (पर्शुम्) हँसिया [दराँती] को (प्र यच्छ) ले, (त्वरय=०−या) वेग से (आ हर) ले आ, (ओषधीः) ओषधियों [अन्न आदि] को (अहिंसन्तः) हानि न करते हुए वे [लावा लोग] (पर्वन्) गाँठ पर (ओषम्) झटपट (दान्तु) काटें। (यासाम्) जिन [अन्न आदि] के (राज्यम्) राज्य को (सोमः) चन्द्रमा [वा जल] ने (परि बभूव) घेर लिया था, (अमन्युताः) क्रोध को न फैलाती हुई (वीरुधः) वे ओषधें [अन्न आदि] (नः) हमें (भवन्तु) प्राप्त होवें ॥३१॥
भावार्थभाषाः - जैसे जब खेती चन्द्रमा और जल के संयोग से पक जाती है, तब किसान चतुर कटवैयों से यथाविधि कटवा कर अन्न आदि पाता है, वैसे ही विद्वान् पुरुष विद्वानों के संयोग से ईश्वरज्ञान प्राप्त करके सुखी होता है ॥३१॥ पदपाठ में (त्वरय) के स्थान पर [त्वरया] सुबन्त मान कर हम ने अर्थ किया है। यदि तिङन्त होता तो [तिङ्ङतिङः। पा० ८।१।२८।] इस सूत्र से वह सब अनुदात्त होता ॥
टिप्पणी: ३१−(प्र यच्छ) नियमय। संगृहाण (पर्शुम्) आङ्परयोः खनिशॄभ्यां डिच्च। उ० १।३३। पर+शॄ हिंसायाम्−कु, अकारलोपः। शस्त्रभेदम्। कुठारादिकम् (त्वरय) त्वरया। वेगेन (आहर) आनय (ओषम्) क्षिप्रम्−निघ० २।१५। (अहिंसन्तः) अहानिं कुर्वन्तः (ओषधीः) अन्नादीन् (दान्तु) लुनन्तु (पर्वन्) पर्वणि। ग्रन्थौ (यासाम्) ओषधीनाम् (सोमः) चन्द्रः जलम् (परि) परितः (राज्यम्) राष्ट्रम् (बभूव) प्राप (अमन्युताः) अमन्यु+तनु विस्तारे−ड, टाप्। अमन्योरक्रोधस्य विस्तारिकाः (नः) अस्मान् (वीरुधः) ओषधयः (भवन्तु) प्राप्नुवन्तु ॥