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जनि॑त्रीव॒ प्रति॑ हर्यासि सू॒नुं सं त्वा॑ दधामि पृथि॒वीं पृ॑थि॒व्या। उ॒खा कु॒म्भी वेद्यां॒ मा व्य॑थिष्ठा यज्ञायु॒धैराज्ये॒नाति॑षक्ता ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

जनित्रीऽइव । प्रति । हर्यासि । सूनुम् । सम् । त्वा । दधामि । पृथिवीम् । पृथिव्या । उखा । कुम्भी । वेद्याम् । मा । व्यथिष्ठा: । यज्ञऽआयुधै: । आज्येन । अतिऽसक्ता ॥३.२३॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:23


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परस्पर उन्नति करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे प्रजा ! स्त्री वा पुरुष] (प्रति) निश्चय करके (हर्यासि) [परस्पर] प्यार कर, (जनित्री इव) जैसे माता (सूनुम्) पुत्र को, (पृथिवीम् त्वा) तुझ प्रख्यात को (पृथिव्या) प्रख्यात [विद्या] के साथ (सं दधामि) मैं [परमेश्वर] संयुक्त करता हूँ। (वेद्याम्) वेदी [अंगीठी आदि] के ऊपर (यज्ञायुधैः) यज्ञ के शस्त्रों से (आज्येन) घी के साथ (अतिवक्ता) दृढ़ जमाई हुई (उखा) हाँडी [वा] (कुम्भी) बटलोयी [के समान] (मा व्यथिष्ठाः) तू मत डगमगा ॥२३॥
भावार्थभाषाः - सब स्त्री-पुरुष वेद द्वारा विद्या प्राप्त करके परस्पर प्रीतिपूर्वक रहें और कठिनाई पड़ने पर निरन्तर धर्म में जमे रहें, जैसे दृढ़ जमाई हुई कढ़ाही आदि भट्टे चूल्हे आदि पर निरन्तर ठहरी रहती है ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(जनित्री) जनयित्री। जननी (इव) यथा (प्रति) निश्चयेन (हर्यासि) लेटि रूपम्। हर्य। परस्परं कामयस्व (सूनुम्) पुत्रम् (सम्) संयुज्य (दधामि) धरामि (पृथिवीम्) म० २२। प्रख्याताम् (पृथिव्या) प्रख्यातया विद्यया सह (उखा) पाकपात्रम् (कुम्भी) स्थाली (वेद्याम्) अग्न्याधारे (मा व्यथिष्ठाः) व्यथां मा प्राप्नुहि (यज्ञायुधैः) यज्ञोपकरणैः (आज्येन) घृतेन सह (अतिवक्ता) षञ्ज सङ्गे−क्त। अतिदृढीकृता ॥