परस्पर उन्नति करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पशवः) सब जीवों ने (सप्त) सात [त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] (मेधान्) परस्पर मिले हुए [पदार्थों] को (परि अगृह्णन्) ग्रहण किया है, (त्रयस्त्रिंशत्) तेंतीस [वसु आदि] (देवता) देवता (तान्) उन [जीवों] को (सचन्ते) सेवते हैं, (यः) जो [पुरुष] (एषाम्) इन [जीवों] में से (ज्योतिष्मान्) तेजस्वी है, (उत) और (यः) जिसने [विज्ञान को] (चकर्श) सूक्ष्म किया है, (सः) वह तू (नः) हमको (स्वर्गम्) सुख पहुँचानेवाले (लोकम् अभि) समाज में (नेष) पहुँचा ॥१६॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्यों में त्वचा, नेत्र, कान आदि समान हैं और सब पर वसु आदि प्राकृत पदार्थों का समान प्रभाव है, परन्तु विज्ञानी पुरुष ही आप सुखी रहते और सब को सुखी रखते हैं ॥१६॥ सप्त मेघान् के विषय में (सप्तऋषयः) पद देखो−अ० ४।११।९। और तेंतीस देवता यह हैं−८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य वा महीने, १ इन्द्र वा बिजुली, १ प्रजापति वा यज्ञ−इन की विशेष व्याख्या अ० १०।७।१३। के भावार्थ में देखो ॥