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यद्य॑त्कृ॒ष्णः श॑कु॒न एह ग॒त्वा त्सर॒न्विष॑क्तं॒ बिल॑ आस॒साद॑। यद्वा॑ दा॒स्या॒र्द्रह॑स्ता सम॒ङ्क्त उ॒लूख॑लं॒ मुस॑लं शुम्भतापः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत्ऽयत् । कृष्ण: । शकुन: । आ । इह । गत्वा । त्सरन् । विऽसक्तम् । बिले । आऽससाद । यत् । वा । दासी । आर्द्रऽहस्ता । सम्ऽअङ्क्ते । उलूखलम् । मुसलम् । शुम्भत । आप: ॥३.१३॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:13


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परस्पर उन्नति करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यद्यत्) जब कभी (कृष्णः) कुदेरनेवाला (शकुनः) चिल्ल आदि पक्षी [समान दुष्ट पुरुष] (इह) यहाँ (आ गत्वा) आकर (विषक्तम्) विरुद्ध मेल से (त्सरन्) टेढ़ा चलता हुआ (बिले) बिल [हमारे घर आदि] में (आससाद) आया है। (वा) अथवा (यत्) यदि (आर्द्रहस्ता) भीगे हाथवाली (दासी) हिंसक स्त्री (उलूखलम्) ओखली और (मुसलम्) मूसल को (समङ्क्ते) लिथेड़ देती है, (आपः) हे आप्त प्रजाओ ! [उस दोष को] (शुम्भत) नाश करो ॥१३॥
भावार्थभाषाः - यदि कोई कपटी दुष्ट पुरुष हमारे व्यवहारों में अथवा कोई कुटिला स्त्री हमारे घर के वस्त्र वासन आदि में बखेड़ा डाले, विद्वान् स्त्री-पुरुष उस दोष का प्रतीकार करें ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(यद्यत्) यस्मिन्नेव काले (कृष्णः) कृष विलेखने−नक्। विलेखकः (शकुनः) अ० ११।२।२४। चिल्लपक्षिसमानदुष्टः पुरुषः (इह) (आ गत्वा) आगत्य (त्सरन्) कपटेन गच्छन् (विषक्तम्) यथा तथा विरुद्धमेलनेन (बिले) छिद्रे। गृहे (आससाद) आजगाम (यत्) यदि (वा) अथवा (दासी) अ० ५।१३।८। दास हिंसायाम्−घञ्। ङीप्। हिंस्रा स्त्री (आर्द्रहस्ता) क्लिन्नहस्ता। मलिनकरा (समङ्क्ते) लिम्पते (उलूखलम्) (मुसलम्) (शुम्भत) शुम्भ हिंसायाम् नाशयत् दोषम् (आपः) हे आप्ताः प्रजाः ॥