राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (क्रव्यादम्) मांसभक्षक [क्रूर] (अग्निम्) अग्नि [समान सन्तापक मनुष्य] को (दूरम्) दूर [प्र हिणोमि] बाहिर पहुँचाता हूँ, (रिप्रवाहः) वह पाप का ले चलनेवाला पुरुष (यमराज्ञः) न्यायाधीश राजा के पुरुषों में (गच्छतु) जावे। (इह) यहाँ पर (अयम्) यह (इतरः) दूसरा [पापी से भिन्न धर्मात्मा], (जातवेदाः) वेदों का ज्ञाता, (देवः) विजय चाहनेवाला राजा (हव्यम्) देने-लेने योग्य पदार्थ को (प्रजानन्) भले प्रकार जानता हुआ (देवेभ्यः) विजय चाहनेवाले पुरुषों के लिये (वहतु) पहुँचावे ॥८॥
भावार्थभाषाः - जब प्रजागण राजा से मिलकर अत्याचारियों को दण्ड दिलाते हैं, तब वह ज्ञानी राजा धर्मात्माओं के सत्कार करने में समर्थ होता है ॥८॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१६।९। और यजुर्वेद ३५।१९ ॥