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पुन॑स्त्वादि॒त्या रु॒द्रा वस॑वः॒ पुन॑र्ब्र॒ह्मा वसु॑नीतिरग्ने। पुन॑स्त्वा॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॒राधा॑द्दीर्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पुन: । त्वा । आदित्या: । रुद्रा: । वसव: । पुन: । ब्रह्मा । वसुऽनीति: । अग्ने । पुन: । त्वा । ब्रह्मण: । पति: । आ । अधात् । दीर्घायुऽत्वाय । शतऽशारदाय ॥२.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी राजन् !] (पुनः) निश्चय करके [विद्वत्ता शूरता आदि गुण देखकर] (त्वा) तुझको (आदित्याः) अखण्डव्रती ब्रह्मचारियों, (रुद्राः) ज्ञानवालों और (वसवः) श्रेष्ठ पुरुषों ने, [तथा] (पुनः) निश्चय करके (वसुनीतिः) श्रेष्ठ गुण प्राप्त करानेवाले (ब्रह्मा) ब्रह्मा [वेदों के ज्ञाता] ने, और (पुनः) निश्चय करके (त्वा) तुझ को (ब्रह्मणस्पतिः) धन के रक्षक पुरुष ने (शतशारदाय) सौ वर्षोंवाले (दीर्घायुत्वाय) चिरकाल जीवन के लिये (आ) भले प्रकार (अधात्) धारण किया है ॥६॥
भावार्थभाषाः - सब चतुर विद्वान् लोग सद्गुणों की भली-भाँति परीक्षा करके महापुरुषार्थी सुयोग्य पुरुष को राजा बनावें, जो प्रजागणों को सुख पहुँचाकर दीर्घजीवनयुक्त करे ॥६॥ इस मन्त्र का मिलान करो−यजु० १२।४४ ॥
टिप्पणी: ६−(पुनः) निश्चयेन। विद्वत्ताशूरतादिगुणपरीक्षणेन (त्वा) त्वां राजानम् (आदित्याः) अखण्डव्रतब्रह्मचारिणः (रुद्राः) अ० २।२७।६। रुत् ज्ञानम्, रो मत्वर्थीयः। ज्ञानवन्तः (वसवः) श्रेष्ठाः (पुनः) निश्चयेन (ब्रह्मा) वेदानां ज्ञाता (वसुनीतिः) श्रेष्ठगुणप्रापकः (अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् राजन् (पुनः) (त्वा) (ब्रह्मणः) अन्नस्य। धनस्य (पतिः) रक्षकः (आ) समन्तात् (अधात्) धारितवान् (दीर्घायुत्वाय) चिरकालजीवनाय (शतशारदाय) अ० १।३५।१। शतसंवत्सरयुक्ताय ॥