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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [मनुष्य] (मनसा) अपने मन से (प्र इव) आगे बढ़ता हुआ सा (पिपतिषति) ऐश्वर्यवान् होना चाहता है और (मुहुः) वारंवार (पुनः) पीछे को (आ वर्तते) लौट आता है। (यान्=यम्) जिस [मनुष्य] को (क्रव्यात्) मांसभक्षक (अग्निः) अग्नि [समान सन्तापकारी दोष आदि] (अन्तिकात्) निकट से (अनुविद्वान्) निरन्तर जानता हुआ (वितावति) सता डालता है ॥५२॥
भावार्थभाषाः - पापी मनुष्य यद्यपि अपने को ऐश्वर्यवान् बनाने की चेष्टा करता है, परन्तु सत्य बल न होने से गिरता ही जाता है ॥५२॥ इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध पीछे−म० ३८ में आ चुका है ॥
टिप्पणी: ५२−(प्र इव) प्रकर्षेण गच्छन् यथा (पिपतिषति) पत्लृ गतौ ऐश्वर्ये च−सन्। ऐश्वर्यवान् भवितुमिच्छति (मनसा) चित्तेन (मुहः) वारंवारम् (आ वर्तते) आगत्य वर्तते (पुनः) पश्चात्। अन्यत् पूर्ववत्−म० ३८ ॥
