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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (अश्रद्धाः) श्रद्धाहीन (धनकाम्या) धन की कामना से (क्रव्यादा) मांसभक्षक [पाप] के साथ (समासते) मिलकर बैठते हैं। (ते) वे लोग (वै) निश्चय कर के (अन्येषाम्) दूसरों की (कुम्भीम्) हाँडी को (सर्वदा) सदा (पर्यादधति) चढ़ाते हैं ॥५१॥
भावार्थभाषाः - जो लोग परमेश्वर में श्रद्धा नहीं रखते और कुकर्मों में फँस कर पाप करते हैं, वे निर्धनी होकर पराधीन होते हैं ॥५१॥
टिप्पणी: ५१−(ये पुरुषाः) (अश्रद्धाः) श्रद्धाहीनाः (धनकाम्या) वसिवपियजि०। उ० ४।२५। कमु कान्तौ−इञ्। धनस्य कामनया (क्रव्यादा) मांसभक्षकेण पापेन सह (समासते) मिलित्वा तिष्ठन्ति (ते) पुरुषाः (वै) निश्चयेन (अन्येषाम्) (कुम्भीम्) उखाम्। स्थालीम् (पर्य्यादधति) चुल्लिप्रदेशे स्थापयन्ति (सर्वदा) ॥
