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यत्त्वा॑ क्रु॒द्धाः प्र॑च॒क्रुर्म॒न्युना॒ पुरु॑षे मृ॒ते। सु॒कल्प॑मग्ने॒ तत्त्वया॒ पुन॒स्त्वोद्दी॑पयामसि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । त्वा । क्रुध्दा: । प्रऽचक्रु: । मन्युना । पुरुषे । मृते । सुऽकल्पम् । अग्ने । तत् । त्वया । पुन: । त्वा । उत् । दीपयामसि ॥२.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:5


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे अपराधी !] (यत्) यदि (त्वा) तुझ को (क्रुद्धाः) क्रोधित पुरुषों ने (पुरुषे मृते) पुरुष के मरने पर (मन्युना) कोप से (प्रचक्रुः) निकाल दिया था। (अग्ने) हे अग्नि ! [समान सन्तापकारी पुरुष] (तत्) वह (त्वया) तेरे साथ (सुकल्पम्) सुन्दर विचारयुक्त विधान है, (पुनः) फिर (त्वा) तुझ को [सुकर्म के लिये] (उत् दीपयामसि) हम उत्तेजित करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - राजपुरुषों को उचित है कि यदि अपराधी पुरुष दण्ड भोगने से सुधरे तो उस से अनुकूल व्यवहार करके सुकर्म के लिये उसका उत्साह बढ़ावें ॥५॥
टिप्पणी: ५−(यत्) यदि (त्वा) अपराधिनम् (क्रुद्धाः) कुपिताः (प्रचक्रुः) बहिष्कृतवन्तः (मन्युना) कोपेन (पुरुषे) (मृते) मरणं गते (सुकल्पम्) सुसंकल्पं विधानम् (अग्ने) हे अग्निवत्सन्तापक (तत्) कर्म (त्वया) अपराधिना सह (पुनः) पश्चात् (त्वा) (उद्दीपयामसि) उत्तेजयामः सुकर्मणे ॥