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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप ! [परमेश्वर] (सर्वान्) सब (सपत्नान्) वैरियों को (सहमानः) हराता हुआ तू (एषाम्) इनके (ऊर्जम्) अन्न और (रयिम्) धन को (अस्मासु) हम [धर्मात्माओं] में (आ धेहि) सब प्रकार धारण कर ॥४६॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर के नियम से धर्मात्मा लोग अधर्मियों को सदा नीचा रखते हैं ॥४६॥
टिप्पणी: ४६−(सर्वान्) (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् (सहमानः) अभिभवन् (सपत्नान्) शत्रून् (आ) समन्तात् (एषाम्) शत्रूणाम् (ऊर्जम्) अन्नम् (रयिम्) धनम् (अस्मासु) धार्मिकेषु (धेहि) धारय ॥
