0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [जो] (देवानाम्) उत्तम गुणों का और (मनुष्याणाम्) [मननशील] मनुष्यों का (अन्तर्धिः) भीतर से धारण करनेवाला और (परिधिः) सब ओर से धारण करनेवाला है, [वह] (गार्हपत्यः) गृहपतियों से संयुक्त (अग्निः) ज्ञानस्वरूप [परमेश्वर] (उभयान् अन्तरा) दोनों पक्षों [उत्तम गुणों और मनुष्यों] के भीतर (श्रितः) ठहरा है ॥४४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सब के भीतर और बाहिर व्यापक होकर सर्वनियन्ता है, उसे गृहपति विद्वान् लोग साक्षात् करके सुख पाते हैं ॥४४॥
टिप्पणी: ४४−(अन्तर्धिः) उपसर्गे घोः कि। पा० ३।३।९२। श्रदन्तरोरुपसर्गवद्वृतिः। वा० पा० ३।१०६। अन्तर्+डुधाञ् धारणपोषणयोः−कि। मध्ये धारकः (देवानाम्) दिव्यगुणानाम् (परिधिः) सर्वतो धारकः (मनुष्याणाम्) मननशीलानां जनानाम् (अग्निः) ज्ञानस्वरूपः परमेश्वरः (गार्हपत्यः) गृहपतिभिः संयुक्तः (उभयान्) देवमनुष्यान् (अन्तरा) मध्ये (श्रितः) स्थितः ॥
