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अग्ने॑ अक्रव्या॒न्निः क्र॒व्यादं॑ नु॒दा दे॑व॒यज॑नं वह ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने । अक्रव्यऽअत् । नि: । क्रव्यऽअदम् । नुद । आ । देवऽयजनम् । वह ॥२.४२॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:42


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अक्रव्यात्) हे अमांसभक्षक ! [शान्तस्वभाव] (अग्ने) अग्नि [समान तेजस्वी पुरुष !] (क्रव्यादम्) मांसभक्षक [दोष] को (निः नुद) बाहर ढकेल दे, और (देवयजनम्) विद्वानों के सत्कारयोग्य व्यवहार को (आ वह) यहाँ ला ॥४२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग दुष्ट व्यवहारों को छोड़ कर वैदिक व्यवहारों का प्रचार करें ॥४२॥
टिप्पणी: ४२−(अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् विद्वन् (अक्रव्यात्) हे अमांसभक्षक ! शान्तस्वभाव (क्रव्यादम्) मांसभक्षकं दोषम् (निर्णुद) निःसारय (देवयजनम्) देव+यज−ल्यु। विद्वद्भिः पूजितव्यवहारम् (आ वह) प्रापय ॥