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ता अ॑ध॒रादुदी॑ची॒राव॑वृत्रन्प्रजान॒तीः प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑। पर्व॑तस्य वृष॒भस्याधि॑ पृ॒ष्ठे नवा॑श्चरन्ति स॒रितः॑ पुरा॒णीः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ता:। अधरात् । उदीची: । आ । अववृत्रन् । प्रऽजानती: । पथिऽभि: । देवऽयानै: । पर्वतस्य । वृषभस्य । अधि । पृष्ठे । नवा: । चरन्ति । सरित: । पुराणी: ॥२.४१॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:41


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अधरात्) नीचे से (उदीचीः) ऊँची चलती हुई, (प्रजानतीः) बहुत जाननेवाली (ताः) वे [आप्त प्रजाएँ−म० ४०] (देवयानैः) विद्वानों के चलने योग्य (पथिभिः) मार्गों से (आ अववृत्रन्) घूम कर आई हैं। (वृषभस्य) बरसते हुए (पर्वतस्य) पहाड़ की (पृष्ठे अधि) पीठ के ऊपर (नवाः) नीवन (सरितः) नदियाँ (पुराणीः) पुरानी [नदियों] को (चरन्ति) चली जाती हैं ॥४१॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य वेद शास्त्रों की मर्यादा पर चलकर, छोटी दशा से बड़े होते हैं, जैसे बरसते हुए पहाड़ से छोटी-छोटी नवीन नदियाँ निकल कर पुरानी बड़ी नदियों में मिलकर बड़ी होती जाती हैं ॥४१॥
टिप्पणी: ४१−(ताः) आपः। आप्ताः प्रजाः−म० ४०। (अधरात्) निम्नपदात् (उदीचीः) उपरिगच्छन्त्यः (आ अववृत्रन्) म० २२। आवृता अभवन् (प्र जानतीः) बहुविदुष्यः (पथिभिः) मार्गैः (देवयानैः) विद्वद्भिर्गन्तव्यैः (पर्वतस्य) शैलस्य (वृषभस्य) वृषु सेचने−अभच् कित्। वर्णशीलस्य (अधि) उपरि (पृष्ठे) उच्चप्रदेशे, (नवाः) नवीनाः (चरन्ति) प्राप्नुवन्ति (सरितः) नद्यः (पुराणीः) पुरातनीर्नदीः ॥