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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (संकसुकात्) यथावत् शासक (अग्नेः) अग्नि [समान तेजस्वी पुरुष] से पृथक् होकर (यत्) जो कुछ (रिप्रम्) पाप (च) और (यत्) जो कुछ (शमलम्) भ्रष्ट व्यवहार (च) और (यत्) जो कुछ (दुष्कृतम्) दुष्ट कर्म (चकृम) हमने किया है, (आपः) आप्त प्रजाएँ [यथार्थवक्ता लोग] (मा) मुझको (तस्मात्) उस [पापादि] से पृथक् करके (शुम्भन्तु) शोभायमान करें ॥४०॥
भावार्थभाषाः - यदि मनुष्य सुसंगति छोड़ कर पाप कर्म करे, तो वह विद्वानों यथार्थ उपदेशकों का आश्रय लेकर अपने को फिर शुद्ध पवित्र बनावे ॥४०॥
टिप्पणी: ४०−(यत्) यत् किञ्चित् (रिप्रम्) पापम् (शमलम्) अ० ४।९।६। शकिशम्योर्नित्। उ० १।११२। शमु उपशमे−कल प्रत्ययः। अशुद्धव्यवहारम् (चकृम) वयं कृतवन्तः (यत्) (च) (दुष्कृतम्) (आपः) आप्ताः प्रजाः−दयानन्दभाष्ये, यजु० ६।२७। यथार्थवक्तारः पुरुषाः (मा) माम् (तस्मात्) पापादिकर्मणः पृथक् कृत्वा (शुम्भन्तु) शुम्भ दीप्तौ शोभायाम्। शुम्भयन्तु। शोभयन्तु (अग्नेः) अग्निवत्तेजस्विनः पुरुषात् पृथग् भूत्वा (संकसुकात्) म० ११। सम्यक् शासकात् (च) (यत्) ॥
