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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह पुरुष (अयज्ञियः) संगति के अयोग्य, (हतवर्चाः) नष्ट तेजवाला (भवति) हो जाता है, (एनेन) इस कारण से [उसे] (हविः) ग्राह्य अन्न (अत्तवे) खाना (न) नहीं [होता] [उस को] (क्रव्यात्) मांसभक्षक [दोष वा रोग] (कृष्याः) खेती से, (गोः) गौ से और (धनात्) धन से (छिनत्ति) काट देता है, वह [मांसभक्षक] (यम् अनुवर्तते) जिस पुरुष के पीछे पड़ जाता है ॥३७॥
भावार्थभाषाः - खोटे कुकर्मी मनुष्य से न कोई मिलता है और न वह अन्न आदि पदार्थ पा सकता है, तब वह दुराचारी महादुःखी होता है ॥३७॥
टिप्पणी: ३७−(अयज्ञियः) असंगतियोग्यः (हतवर्चाः) नष्टतेजाः (भवति) (नः) निषेधे (एनेन) अनेन कारणेन (हविः) ग्राह्यमन्नम् (अत्तवे) खादितुम् (छिनत्ति) कृन्तति तमिति शेषः (कृष्याः) कृषिकर्मसकाशात् (गोः) धेनुसकाशात् (धनात्) (यम्) पुरुषम् (क्रव्यात्) मांसभक्षको दोषः, (अनुवर्तते) अनुगच्छति ॥
