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अ॑यज्ञि॒यो ह॒तव॑र्चा भवति॒ नैने॑न ह॒विरत्त॑वे। छि॒नत्ति॑ कृ॒ष्या गोर्धना॒द्यं क्र॒व्याद॑नु॒वर्त॑ते ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अयज्ञिय: । हतऽवर्चा: । भवति । न । एनेन । हवि: । अत्तवे । छिनत्ति । कृष्या: । गो: । धनात् । यम् । कव्यऽअत् । अनुऽवर्तते ॥२.३७॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:37


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - वह पुरुष (अयज्ञियः) संगति के अयोग्य, (हतवर्चाः) नष्ट तेजवाला (भवति) हो जाता है, (एनेन) इस कारण से [उसे] (हविः) ग्राह्य अन्न (अत्तवे) खाना (न) नहीं [होता] [उस को] (क्रव्यात्) मांसभक्षक [दोष वा रोग] (कृष्याः) खेती से, (गोः) गौ से और (धनात्) धन से (छिनत्ति) काट देता है, वह [मांसभक्षक] (यम् अनुवर्तते) जिस पुरुष के पीछे पड़ जाता है ॥३७॥
भावार्थभाषाः - खोटे कुकर्मी मनुष्य से न कोई मिलता है और न वह अन्न आदि पदार्थ पा सकता है, तब वह दुराचारी महादुःखी होता है ॥३७॥
टिप्पणी: ३७−(अयज्ञियः) असंगतियोग्यः (हतवर्चाः) नष्टतेजाः (भवति) (नः) निषेधे (एनेन) अनेन कारणेन (हविः) ग्राह्यमन्नम् (अत्तवे) खादितुम् (छिनत्ति) कृन्तति तमिति शेषः (कृष्याः) कृषिकर्मसकाशात् (गोः) धेनुसकाशात् (धनात्) (यम्) पुरुषम् (क्रव्यात्) मांसभक्षको दोषः, (अनुवर्तते) अनुगच्छति ॥