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अ॑पा॒वृत्य॒ गार्ह॑पत्यात्क्र॒व्यादा॒ प्रेत॑ दक्षि॒णा। प्रि॒यं पि॒तृभ्य॑ आ॒त्मने॑ ब्र॒ह्मभ्यः॑ कृणुता प्रि॒यम् ॥

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पद पाठ

अपऽआवृत्य । गार्हऽपत्यात् । क्रव्यऽअदा । प्र । इत । दक्षिणा । प्रियम् । पितृऽभ्य: । आत्मने । ब्रह्मऽभ्य: । :कृणुत । प्रियम् ॥२.३४॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:34


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (गार्हापत्यात्) गृहपति से संयुक्त ज्ञान से [विरुद्ध वर्तमान] (क्रव्यादा) मांसभक्षक [अज्ञान] के साथ [ठहरने से] (अपावृत्य) हटकर (दक्षिणा) सरल [सीधे वा वृद्धिकारक] मार्ग में (प्र इत) चले चलो और (आत्मने) अपने लिये और (पितृभ्यः) पितर [रक्षक] (ब्रह्मभ्यः) ब्रह्माओं [वेदज्ञानियों] के लिये (प्रियम्) प्रिय और (प्रियम्) प्रीतिकारक कर्म (कृणुत) करो ॥३४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य शरीर और आत्मा के विरोधी अज्ञान से बचकर वेदमार्ग में चलकर अपना और सब विद्वानों का हित करे ॥३४॥
टिप्पणी: ३४−(अपावृत्य) पृथग् भूत्वा (गार्हपत्यात्) गृहपतिना संयुक्तात् प्रबोधात् प्रतिकूलवर्तमानेन (क्रव्यादा) मांसभक्षकेण अज्ञानेन (प्रेत) प्रकर्षेण गच्छत (दक्षिणा) दक्षिणादाच्। पा० ५।३।३६। दक्षिण−आच्। सरले वृद्धिकारके वा मार्गे (प्रियम्) रुचिरम् (पितृभ्यः) पालकेभ्यः (आत्मने) स्वस्मै (ब्रह्मभ्यः) वेदविद्भ्यः (कृणुत) कुरुत (प्रियम्) तृप्तिकरम् ॥