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अश्म॑न्वती रीयते॒ सं र॑भध्वं वी॒रय॑ध्वं॒ प्र त॑रता सखायः। अत्रा॑ जहीत॒ ये अस॑न्दु॒रेवा॑ अनमी॒वानुत्त॑रेमाभि॒ वाजा॑न् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अश्मन्ऽवती । रीयते । सम् । रभध्वम् । वीरयध्वम् । प्र । तरत । सखाय: । अत्र । जहीत । ये । असन् । दु:ऽएवा । अनमीवान् । उत् । तरेम । अभि । वाजान् ॥२.२६॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:26


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सखायः) हे मित्रो ! (अश्मन्वती) बहुत पत्थरोंवाली [नदी] (रीयते) चलती है, (सं रभध्वम्) मिलकर उत्साह करो, (वीरयध्वम्) वीर बनो और (प्र तरत) पार हो जाओ, (ये) जो (अत्र) यहाँ [इस जगह वा समय] (दुरेवाः) दुर्गम मार्ग [वा विघ्न] (असन्) होवें, [उन्हें] (जहीत) छोड़ो, [पार करो], (अनमीवान्) रोगरहित (वाजान् अभि) अन्न आदि भोगों की ओर (उत्तरेम) हम उतरें ॥२६॥
भावार्थभाषाः - जैसे बड़ी-बड़ी दुस्तर नदी, समुद्र आदि को सेतु नौका आदि से पार करते हैं, वैसे ही वीर विद्वान् पुरुष मिलकर उत्तम प्रयत्नों से संसार के विघ्नों को हटाकर आनन्द पाते हैं ॥२६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋषि दयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में और ऋग्वेद में १०।५३।८। और यजुर्वेद में ३५।१० है ॥
टिप्पणी: २६−(अश्मन्वती) बहुपाषाणवती नदी (रीयते) गच्छति (सं रभध्वम्) मिलित्वा साहसं कुरुत (वीरयध्वम्) वीरकर्म कुरुत (प्र) प्रकर्षेण (तरत) उल्लङ्घयत (सखायः) हे सुहृदः (अत्र) अस्मिन् स्थाने समये वा (जहीत) त्यजत। पारयत (ये) (असन्) लेटि रूपम्। भवन्तु (दुरेवाः) दुर्गमा मार्गाः। विघ्नाः (अनमीवान्) रोगरहितान् (उत्तरेम) पारयेम (अभि) अभिलक्ष्य (वाजान्) अन्नादिभोगान् ॥