राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एषाम्) इन [प्राणियों] के बीच (जीवेभ्यः) जीवते हुए [पुरुषार्थी] लोगों के लिये (इमम्) यह (परिधिम्) मर्यादा (दधामि) मैं [परमेश्वर] ठहराता हूँ, (अपरः) दूसरा [भरा हुआ, दुर्बलेन्द्रिय] (एतम्) इस (अर्थम्) पाने योग्य पदार्थ [सुख] को (नु मा गात्) कभी न पावे। (शतम्) सौ और (पुरूचीः) बहुत सी (शरदः) बरसों तक (जीवन्तः) जीवते हुए लोग (मृत्युम्) मृत्यु [मरण वा दुःख] को (पर्वतेन) [विज्ञान की] पूर्णता से (तिरः दधताम्) तिरोहित करें [ढक देवें] ॥२३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य ब्रह्मचर्य आदि परमेश्वरकृत नियमों पर चलते हैं, वे बहुत काल तक जीकर सुख भोगते हैं और दुर्बलेन्द्रिय लोग नरक में पड़कर शीघ्र मर जाते हैं ॥२३॥ यह मन्त्र ऋषि दयानन्दकृत संस्कारविधि जातकर्मप्रकरण में और कुछ भेद से ऋग्वेद १०।१८।४। और यजुर्वेद ३५।१५। में है ॥