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इ॒मे जी॒वा वि मृ॒तैराव॑वृत्र॒न्नभू॑द्भ॒द्रा दे॒वहू॑तिर्नो अ॒द्य। प्राञ्चो॑ अगाम नृ॒तये॒ हसा॑य सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इमे । जीवा: । वि । मृतै: । आ । अववृत्रन् । अभूत् । भद्रा । देवऽहूति: । न: । अद्य । प्राञ्च: । अगाम । नृतये । हसाय । सुऽवीरास: । विदथम् । आ । वदेम ॥२.२२॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:22


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इमे) ये सब (जीवाः) जीवते हुए [पुरुषार्थी जन] (मृतैः) मृतकों [दुर्बलेन्द्रियों] से (वि) पृथक् होकर (आ अववृत्रन्) लौट आये हैं, (देवहूतिः) विद्वानों की वाणी (नः) हमारे लिये (अद्य) आज (भद्रा) कल्याणी (अभूत्) हुई है। (नृतये) नृत्य [हाथ-पैर चलाने] के लिये और (हसाय) हँसने [आनन्द भोगने] के लिये (प्राञ्चः) आगे बढ़ते हुए हम (अगाम) पहुँचे हैं, (सुवीरासः) अच्छे वीरोंवाले हम (विदथम्) विज्ञान का (आ वदाम) उपदेश करें ॥२२॥
भावार्थभाषाः - जब पुरुषार्थी जन दुर्बलेन्द्रियों के कुमार्गों से हटकर सुमार्ग पर चलते हैं, तब विद्वान् लोग अनेक उद्योगों से आनन्द भोगते हुए पुत्र पौत्र सेवक आदि को वीर बनाते हुए विद्या की उन्नति करते हैं ॥२२॥ इस मन्त्र के पहिले तीन पाद ऋग्वेद १०।१८।३। में और चौथा ऋ० १।११७।२५। में है ॥
टिप्पणी: २२−(इमे) दृश्यमानाः (जीवाः) जीवन्तः पुरुषाः (वि) वियुज्य (मृतैः) मृतकैः। हतपुरुषार्थैः (आ अववृत्रन्) वृतु वर्तने छान्दसो लुङ्। अवृतन्। आवृत्ता अभवन् (अभूत्) (भद्रा) कल्याणी (देवहूतिः) विदुषां वाणी (नः) अस्मभ्यम् (अद्य) अस्मिन् दिने (प्राञ्चः) प्रकर्षेण गच्छन्तः (अगाम) इण् गतौ−लुङ्। अगमाम् (नृतये) नर्तनाय। गात्रविक्षेपाय कर्मानुष्ठानाय (हसाय) हसनाय। सहक्रीडनाय (सुवीरासः) शोभनवीरयुक्ताः (विदथम्) अ० १।१३।४। विज्ञानम् (आ वदेम) उपदिशेम ॥