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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सीसे) बन्धननाशक विधान में [आनेवाले] (मलम्) दोष को (सादयित्वा) मिटाकर और (असिक्न्याम्) बन्धनरहित (अव्याम्) रक्षा करनेवाली प्रकृति [सृष्टि] में [वर्त्तमान] (उपबर्हणे) सुन्दर वृद्धि के भीतर [आनेवाली] (शीर्षक्तिम्) शिर की पीड़ा [रोक] को (मृष्ट्वा) शोधकर, तुम लोग (शुद्धाः) शुद्ध आचरणवाले, (यज्ञियाः) संगतियोग्य (भवत) हो जाओ ॥२०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य संसार के बीच स्वतन्त्रता और उन्नति में आ जानेवाली बाधाओं को हटाकर आनन्दित होवें ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(सीसे) म० १। बन्धननाशके विधाने (मलम्) दोषम् (सादयित्वा) षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु−णिचि−क्त्वा। नाशयित्वा (शीर्षक्तिम्) म० १९। शिरःपीडाम् (उपबर्हणे) म० १९। सुवृद्धौ (अव्याम्) म० १९। रक्षिकायां प्रकृतौ (असिक्न्याम्) अ० १।२३।१। अञ्चिघृसिभ्यः क्तः। उ० ३।८९। इति षिञ् बन्धने−क्त। छन्दसि क्नमित्येके। वा० पा० ४।१।३९। इति असित−ङीप्, तकारस्य क्नः। असितायाम्। अबद्धायाम् (मृष्ट्वा) शोधयित्वा (शुद्धाः) पवित्राः (भवत) (यज्ञियाः) संगतियोग्याः ॥
