पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अघशंसदुःशंसाभ्याम्) दोनों बुरा चीतनेवाले और खोटी करनीवाले पुरुषों के नाश के लिये (तेन) उस (करेण) कर [लेने] से (च) और (अनुकरेण) अनुकूल कर्म से (इतः) यहाँ से (सर्वम्) सब (यक्ष्मम्) राजरोग (च च) और (मृत्युम्) मृत्यु को (निः अजामसि) हम बाहिर निकालते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा को योग्य है कि दूत आदि द्वारा कुमार्गियों के कुविचारों और कुकर्मों को जानकर उनसे कर लेकर और शिक्षा देकर प्रजा में से कुरोग और कुमृत्यु को हटावे ॥२॥
टिप्पणी: २−(अघशंसदुःशंसाभ्याम्) अघ पापकरणे−पचाद्यच्+शसि इच्छायाम्−अच्, दुर्+शंसु दुर्गतौ−पचाद्यच्। क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः। पा० २।३।५। अघशंसदुःशंसौ अनिष्टचिन्तकदुष्कर्मिणौ नाशयितुम् (करेण) राजग्राह्यधनेन (अनुकरेण) अनुकूलकर्मणा (च) (यक्ष्मम्) राजरोगम् (च) (सर्वम्) (तेन) (इतः) अस्मात् स्थानात् (मृत्युम्) मरणम् (च) (निरजामसि) बहिष्कुर्मः ॥
