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समि॑द्धो अग्न आहुत॒ स नो॒ माभ्यप॑क्रमीः। अत्रै॒व दी॑दिहि॒ द्यवि॒ ज्योक्च॒ सूर्यं॑ दृ॒शे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम्ऽइध्द: । अग्ने । आऽहुत: । स: । न: । मा । अभिऽअपक्रमी: । अत्र । एव । दीदिहि । द्यवि । ज्योक् । च । सूर्यम् । दृशे ॥२.१८॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:18


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नि [समान तेजस्वी पुरुष !] (सः) सो तू (समिद्धः) यथावत् प्रकाशित और (आहुतः) आहुति दिया गया [भक्ति किया गया] होकर (नः) हमें (मा अभ्यपक्रमीः) छोड़कर मत जा, (अत्र एव) यहाँ ही [इस जन्म में] (द्यवि) प्रत्येक व्यवहार में [वर्तमान] (सूर्यम्) सूर्य [सब के चलानेवाले परमेश्वर] के (दृशे) देखने के लिये (ज्योक्) बहुत काल तक (च) निश्चय करके (दीदिहि) प्रकाशमान हो ॥१८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को उचित है कि परमात्मा के ज्ञानपूर्वक विद्या शूरता आदि गुणों से तेजस्वी होकर कीर्ति प्राप्त करे ॥१८॥ इस मन्त्र का अन्तिम पाद आ चुका है−अ० १।६।३ ॥
टिप्पणी: १८−(समिद्धः) प्रकाशितः (अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् पुरुष (आहुतः) आहुत्या भक्त्या पूजितः (सः) स त्वम् (नः) अस्मान् (मा अभ्यपक्रमीः) अपक्रम्य मा गच्छ (अत्र) अस्मिञ्जन्मनि (एव) अवश्यम् (दीदिहि) अ० २।६।१। दीप्यस्व (द्यवि) दिवु व्यवहारे−डिवि। प्रत्येकव्यवहारे (ज्योक्) अ० १।६।३। चिरकालम् (च) निश्चयेन (सूर्यम्) जगतः प्रेरकं परमात्मानम् (दृशे) द्रष्टुम् ॥