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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [दुष्ट] (नः) हमारे (अश्वेषु) घोड़ों में और (वीरेषु) वीरों में, (यः) जो (नः) हमारी (गोषु) गौओं में और (अजाविषु) भेड़-बकरियों में और (यः) जो (अग्निः) अग्नि [समान सन्तापकारी दुष्ट] (जनयोपनः) मनुष्यों को व्याकुल करनेवाला है, [उस] (क्रव्यादम्) मांसभक्षक [पिशाच] को (निः नुदामसि) हम निकाले देते हैं ॥१५॥
भावार्थभाषाः - सब धर्मात्मा लोग मिलकर परस्पर सुखवृद्धि के लिये दुराचारी दुःखदायी पुरुष को निकाल देवें ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(यः) दुष्टः (नः) अस्माकम् (अश्वेषु) (वीरेषु) (यः) (नः) (गोषु) धेनुषु (अजाविषु) अजेषु छागेषु अविषु मेषेषु च (क्रव्यादम्) मांसभक्षकम् (निर्णुदामसि) निर्गमयामः (यः) (अग्निः) अग्निवत्सन्तापकः (जनयोपनः) जनानां विमोहकः ॥
