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क्र॒व्याद॑म॒ग्निं श॑शमा॒नमु॒क्थ्यं प्र हि॑णोमि प॒थिभिः॑ पितृ॒याणैः॑। मा दे॑व॒यानैः॒ पुन॒रा गा॒ अत्रै॒वैधि॑ पि॒तृषु॑ जागृहि॒ त्वम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क्रव्यऽअदम् । अग्निम् । शशमानम् । उक्थ्यम् । प्र । हिणोमि । पथिऽभि: । पितृऽयानै: । मा । देवऽयानै: । पुन: । आ । गा: । अत्र । एव । एधि । पितृषु । जागृहि । त्वम् ॥२.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पितृयाणैः) पितरों [रक्षक विद्वानों] के चलने योग्य (पथिभिः) मार्गों से [चलता हुआ] मैं (क्रव्यादम्) मांसभक्षक (अग्निम्) अग्नि [समान सन्तापकारी मनुष्य] को (शशमानम्) उछलकर चलते हुए [उद्योगी] (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय पुरुष से (प्र हिणोमि) बाहिर भेजता हूँ। [हे दुष्कर्मी !] तू (देवयानैः) विद्वानों के मार्गों से [रोकने को] (पुनः) फिर (मा आ गाः) मत आ, [हे सत्कर्मी !] (त्वम्) तू (अत्र एव) यहाँ ही (एधि) रह, और (पितृषु) पितरों [रक्षक विद्वानों] के बीच (जागृहि) जागता रहे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - धर्मज्ञ पुरुषार्थी राजा दुष्टों को सत्पुरुषों से पृथक् कर दे, जिस से धर्मात्माओं के कार्य में विघ्न न पड़े और धर्म की उन्नति सदा होती रहे ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(क्रव्यादम्) मांसभक्षकम् (अग्निम्) अग्निवत् सन्तापकं पुरुषम् (शशमानम्) शश प्लुतगतौ−चानश्। उत्प्लुत्य गन्तारम्। उद्योगिनम् (उक्थ्यम्) अ० ७।४७।१। अकथितं च। पा० १।४।५१। इति कर्मसंज्ञा। प्रशस्यात् (प्र) (हिणोमि) गमयामि (पथिभिः) मार्गैः (पितृयाणैः) पालकैर्गन्तव्यैः (देवयानैः) विदुषां मार्गैः (पुनः) पश्चात् (मा आ गाः) नैवागच्छ (अत्र) (एव) (एधि) भव। वर्तस्व (पितृषु) पालकेषु (जागृहि) सावधानो भव (त्वम्) ॥