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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भूमे मातः) हे धरती माता ! (मा) मुझ को (भद्रया) कल्याणा मति के साथ (सुप्रतिष्ठितम्) बड़ी प्रतिष्ठावाला (नि धेहि) बनाए रख। (कवे) हे गतिशीले ! [जो चलती है वा जिस पर हम चलते हैं] (दिवा) प्रकाश के साथ (संविदाना) मिली हुई तू (मा) मुझ को (श्रियाम्) श्री [सम्पत्ति] में और (भूत्याम्) विभूति [ऐश्वर्य] में (धेहि) धारण कर ॥६३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य उत्तम भाव से पृथिवी पर अपना कर्तव्य पालते हैं, वे बड़ी प्रतिष्ठा पाकर ऐश्वर्यवान् और श्रीमान् होते हैं ॥६३॥ इति प्रथमोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: ६३−(भूमे) हे धरित्रि (मातः) हे निर्मात्रि (नि धेहि) स्थापय (भद्रया) कल्याण्या मत्या (सुप्रतिष्ठितम्) सुप्रतिष्ठायुक्तम् (संविदाना) म० ४८। संगच्छमाना (दिवा) प्रकाशेन (कवे) अ० ४।१।७। कुङ् गतिशोषणयोः हृञ्। कवते, गतिकर्मा−निघ० २।१४। हे गतिशीले (श्रियाम्) सेवनीयायां सम्पत्तौ (मा) माम् (धेहि) धारय (भूत्याम्) प्रापणीयायां विभूतौ। ऐश्वर्ये ॥
