0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शन्तिवा) शान्तिवाली, (सुरभिः) ऐश्वर्यवाली, (स्योना) सुखदा, (कीलालोघ्नी) अमृतमय स्तनवाली (पयस्वती) दुधैल, (भूमिः) सर्वाधार (पृथिवी) पृथिवी (पयसा सह) अन्न के साथ (मे) मेरे लिये (अधि ब्रवीतु) अधिकारपूर्वक बोले ॥५९॥
भावार्थभाषाः - उद्योगी पुरुष परस्पर उपदेश करके पृथिवी से अनेक सुख प्राप्त करते और कराते हैं ॥५९॥
टिप्पणी: ५९−(शन्तिवा) अ० ३।३०।२। शान्तियुक्ता (सुरभिः) म० २३। ऐश्वर्यवती (स्योना) सुखप्रदा (कीलालोघ्नी) उधसोऽनङ्। पा० ५।४।१३१। कीलाल+ऊधस्−अनङ्। बहुव्रीहेरूधसो ङीष्। पा० ४।१।२५। इति ङीष्। अमृतस्तनी (पयस्वती) दुग्धवती (भूमिः) सर्वधाराः (अधि) अधिकृत्य (ब्रवीतु) वदतु (मे) मह्यम् (पृथिवी) विस्तृता भूमिः (पयसा) अन्नेन−निघ० २।७। (सह) ॥
