0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये ग्रामाः) जो गाँव, (यत् अरण्यम्) जो वन, (याः सभाः) जो सभाएँ (भूम्याम् अधि) भूमि पर हैं। (ये संग्रामाः) जो संग्राम और (समितयः) समितिएँ [सम्मेलन] हैं, (तेषु) उन सब में (ते) तेरा (चारु) सुन्दर यश (वदेम) हम कहें ॥५६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि सब स्थानों, सब अवस्थाओं और राजसभा, न्यायसभा, धर्मसभा आदि में पृथिवी के गुणों की महिमा जानकर और बखानकर देशभक्ति करें ॥५६॥
टिप्पणी: ५६−(ये) (ग्रामाः) वासस्थानानि (यत्) (अरण्यम्) वनम् (याः) (सभाः) समाजाः (अधि) उपरि (भूम्याम्) (ये) (संग्रामाः) रणक्षेत्राणि (समितयः) सम्मेलनानि (तेषु) (चारु) सुन्दरं यशः (वदेम) कथयेम (ते) तव ॥
