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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (गन्धर्वाः) दुखदायी हिंसक (अप्सरसः) विरुद्ध चलनेवाले हैं, (च) और (ये) जो (अरायाः) कंजूस (किमीदिनुः) दूसरे पुरुष हैं। (भूमे) हे भूमि ! (तान्) उन (पिशाचान्) पिशाचों [मांसभक्षकों, पीड़ाप्रदों] और (सर्वा) सब (रक्षांसि) राक्षसों को (अस्मत्) हम से (यावय) अलग रख ॥५०॥
भावार्थभाषाः - विवेकी मनुष्यों को योग्य है कि पृथिवी पर के दुष्ट प्राणियों और रोगों का नाश करके धर्मात्माओं को सुखी रक्खें ॥५०॥
टिप्पणी: ५०−(ये) (गन्धर्वाः) अ० ८।६।१९। गन्ध अर्दने−अच्+अर्व हिंसायाम्−अच्, शकन्ध्वादित्वात् पररूपम्। दुःखदायिपीडकाः (अप्सरसः) म० २३। सर्तेरप्पूर्वादसिः। उ० ४।२३७। अप्+सृ गतौ−असि उपसर्गान्त्यलोपः। अपसरणशीलान्। विरुद्धगामिनः (ये) (च) (अरायाः) अ० ११।६।१६। अदातारः (किमीदिनः) अ० १।७।१। पिशुनाः (पिशाचान्) अ० १।१६।३। मांसभक्षकान्। पीडाप्रदान् (सर्वा) सर्वाणि (रक्षांसि) राक्षसान् (तान्) (अस्मत्) (भूमे) (यावय) वियोजय ॥
