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देवता: भूमिः ऋषि: अथर्वा छन्द: जगती स्वर: भूमि सूक्त

नि॒धिं बिभ्र॑ती बहु॒धा गुहा॒ वसु॑ म॒णिं हिर॑ण्यं पृथि॒वी द॑दातु मे। वसू॑नि नो वसु॒दा रास॑माना दे॒वी द॑धातु सुमन॒स्यमा॑ना ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

निऽधिम् । बिभ्रती । बहुऽधा । गुहा । वसु । मणिम् । हिरण्यम् । पृथिवी । ददातु । मे । वसूनि । न: । वसुऽदा: । रासमाना । देवी । दधातु । सुऽमनस्यमाना ॥१.४४॥

अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:44


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राज्य की रक्षा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (गुहा) अपनी गुहा [गढ़े] में (निधिम्) निधि [धन का कोश] (बहुधा) अनेक प्रकार (बिभ्रती) रखती हुई (पृथिवी) पृथिवी (मे) मुझे (वसु) धन (मणिम्) मणि और (हिरण्यम्) सुवर्ण (ददातु) देवे। (वसुदाः) धन देनेवाली, (वसूनि) धनों को (रासमाना) देती हुई (देवी) वह देवी [उत्तम गुणवाली पृथिवी] (सुमनस्यमाना) प्रसन्न मन होकर (नः दधातु) हमारा पोषण करे ॥४४॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वान् मनुष्य पृथिवी को खोजते हैं, वे खानों में से अनेक रत्न और सुवर्ण आदि पाकर प्रसन्नचित्त होते हैं ॥४४॥
टिप्पणी: ४४−(निधिम्) धनसञ्चयम् (बिभ्रती) धरन्ती (बहुधा) अनेकप्रकारेण (गुहा) गुहायाम्। मर्ते (वसु) धनम् (मणिम्) (हिरण्यम्) सुवर्णम् (पृथिवी) (ददातु) (मे) मह्यम् (वसूनि) धनानि (नः) अस्मभ्यम् (वसुदाः) धनदात्री (रासमाना) रासतिर्दानकर्मा−निघ० ३।२०। ददती (देवी) दिव्यगुणा (दधातु) पोषतु (सुमनस्यमाना) अ० १।३५।१। शोभनमनस्का सती ॥