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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राज्य की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा भूमिः) वह भूमि (नः) हमको (धनम्) वह धन (आ) यथावत् (दिशतु) देवे, (यत्) जिसे (कामयामहे) हम चाहते हैं। (भगः) ऐश्वर्य [हमें] (अनुप्रयुङ्क्ताम्) निरन्तर मिले, (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् पुरुष (पुरोगवः) अग्रगामी होकर (एतु) चले ॥४०॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र का अन्वय मन्त्र ३८ और ३९ के साथ है। मनुष्य पृथिवी पर वीर, महात्मा, ब्राह्मणों, योगियों के अनुकरण से वेदविद्या प्राप्त करके ऐश्वर्यवान् होकर अग्रगामी होवें ॥४०॥
टिप्पणी: ४०−(सा) पूर्वोक्ता−म० ३८, ३९ (नः) अस्मभ्यम् (भूमिः) (आ) समन्तात् (दिशतु) ददातु (यत्) (धनम्) (कामयामहे) इच्छामः (भगः) ऐश्वर्यम् (अनुप्रयुङ्क्ताम्) निरन्तरं प्राप्नोतु (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् पुरुषः (एतु) गच्छतु (पुरोगवः) गोरतद्धितलुकि। पा० ५।४।९२। इति पुरस्+गो समासे टच्। अग्रगामी सन् ॥
